श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 81: अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  7.81.6-7 
सरोऽमृतमयं दिव्यमभ्याशे शत्रुसूदनौ।
तत्र मे तद् धनुर्दिव्यं शरश्च निहित: पुरा॥ ६॥
येन देवारय: सर्वे मया युधि निपातिता:।
तत आनीयतां कृष्णौ सशरं धनुरुत्तमम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं के वीर योद्धाओं! वहाँ निकट ही एक दिव्य अमृतमय सरोवर है, जहाँ पूर्वकाल में मेरा दिव्य धनुष-बाण रखा हुआ था, जिसके द्वारा मैंने युद्ध में देवताओं के समस्त शत्रुओं का वध किया था। हे कृष्ण! तुम दोनों उस सरोवर से उस उत्तम धनुष को बाण सहित ले आओ।॥6-7॥
 
O brave warriors of the enemies! There is a divine Amritmay Sarovar nearby, where in the past my divine bow and arrow were kept, with which I killed all the enemies of the gods in the war. Krishna! Both of you bring that excellent bow along with the arrow from that lake.'॥ 6-7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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