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mahabharat 7.81.5: हे पुरुषोत्तम! आप दोनों का स्वागत है। मैं आपकी इच्छा जानता हूँ। मैं आपको वह दे रहा हूँ जो आप दोनों ने यहाँ आते समय चाहा था॥5॥   |   mahabharat अध्याय 7.81: अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 81: अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.81.5 
स्वागतं वां नरश्रेष्ठौ विज्ञातं मनसेप्सितम्।
येन कामेन सम्प्राप्तौ भवद्भॺां तं ददाम्यहम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम! आप दोनों का स्वागत है। मैं आपकी इच्छा जानता हूँ। मैं आपको वह दे रहा हूँ जो आप दोनों ने यहाँ आते समय चाहा था॥5॥
 
‘Best of men! You both are welcome. I know your desire. I am giving you what you both desired when you came here.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)