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श्लोक 7.81.5  |
स्वागतं वां नरश्रेष्ठौ विज्ञातं मनसेप्सितम्।
येन कामेन सम्प्राप्तौ भवद्भॺां तं ददाम्यहम्॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| हे पुरुषोत्तम! आप दोनों का स्वागत है। मैं आपकी इच्छा जानता हूँ। मैं आपको वह दे रहा हूँ जो आप दोनों ने यहाँ आते समय चाहा था॥5॥ |
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| ‘Best of men! You both are welcome. I know your desire. I am giving you what you both desired when you came here.॥ 5॥ |
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