|
| |
| |
श्लोक 7.81.25  |
तथा भवेनानुमतौ महासुरनिघातिना।
इन्द्राविष्णू यथा प्रीतौ जम्भस्य वधकाङ्क्षिणौ॥ २५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| जैसे पूर्वकाल में जम्भासुर को मारने की इच्छा रखने वाले इन्द्र और विष्णु महासुर के संहारक भगवान शंकर की आज्ञा पाकर प्रसन्नतापूर्वक लौट आए थे, उसी प्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुन भी प्रसन्नतापूर्वक अपने शिविर में लौट आए॥25॥ |
| |
| Just as in earlier times, Indra and Vishnu, who wanted to kill Jambhasura, returned happily after getting the permission of Lord Shankar, the destroyer of Mahasur, similarly Shri Krishna and Arjun also returned to their camp happily. 25॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनस्य पुन: पाशुपतास्त्रप्राप्तौ एकाशीतितमोऽध्याय:॥ ८१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें अर्जुनको पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८१॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|