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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 81: अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.81.2 
तं चोपहारं सुकृतं नैशं नैत्यकमात्मना।
ददर्श त्र्यम्बकाभ्याशे वासुदेवनिवेदितम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने देखा कि जो उपहार उन्होंने श्री कृष्ण को प्रतिदिन रात्रि में अर्पित किया था, वह त्रिनेत्रधारी भगवान शिव के पास रखा हुआ है।
 
He saw the daily night gift which he had offered to Shri Krishna, kept near the three-eyed Lord Shiva.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)