श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 81: अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.81.16 
तत: पार्श्वाद् वृषाङ्कस्य ब्रह्मचारी न्यवर्तत।
पिङ्गाक्षस्तपस: क्षेत्रं बलवान् नीललोहित:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तब भगवान शंकर के पार्श्व से एक ब्रह्मचारी प्रकट हुआ, जिसके कनपटी के समान नेत्र थे, जो तपश्चर्या में लीन था, बलवान था और जिसका वर्ण नीलवर्ण का था ॥16॥
 
Then a celibate appeared from the side of Lord Shankar, who had pingle eyes, was in the field of penance, was strong and had a bluish complexion. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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