श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 81: अर्जुनको स्वप्नमें ही पुन: पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.81.1 
संजय उवाच
तत: पार्थ: प्रसन्नात्मा प्राञ्जलिर्वृषभध्वजम्।
ददर्शोत्फुल्लनयन: समस्तं तेजसां निधिम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं- राजन! तत्पश्चात कुन्तीकुमार अर्जुन प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर प्रसन्न नेत्रों से समस्त तेज के भण्डार भगवान वृषभध्वज को देखा।
 
Sanjay says- Rajan! Thereafter, Kuntikumar Arjun became happy and with folded hands, saw Lord Vrishabhadhwaja, the storehouse of all splendor, with joyful eyes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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