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mahabharat 7.80.44-47: वे जगत् के आदि कारण, जगत् के रचयिता, अजन्मा, ईश्वर, अमर, मन की उत्पत्ति के मूल कारण, आकाश और वायु के स्वरूप, तेज के आश्रय, जल के रचयिता, पृथ्वी के परम कारण, देवता, दानव, यक्ष और मनुष्य के परम कारण, समस्त योगों के परम आश्रय, ब्रह्मवेत्ताओं के प्रत्यक्ष कोष, चराचर जगत के रचयिता और संहारकर्ता, इन्द्र के प्रताप और सूर्यदेवता आदि के भी प्रतापी हैं। वे गुणों को प्रकट करने वाले ईश्वर थे। उनके क्रोध में काल का वास था। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने मन, वाणी, बुद्धि और कर्मों के द्वारा उनकी आराधना की। 44-47॥   |   mahabharat अध्याय 7.80: अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 80: अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 44-47
 
 
श्लोक  7.80.44-47 
लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम्।
मनस: परमं योनिं खं वायुं ज्योतिषां निधिम्॥ ४४॥
स्रष्टारं वारिधाराणां भुवश्च प्रकृतिं पराम्।
देवदानवयक्षाणां मानवानां च साधनम्॥ ४५॥
योगानां च परं धाम दृष्टं ब्रह्मविदां निधिम्।
चराचरस्य स्रष्टारं प्रतिहर्तारमेव च॥ ४६॥
कालकोपं महात्मानं शक्रसूर्यगुणोदयम्।
ववन्दे तं तदा कृष्णो वाङ्मनोबुद्धिकर्मभि:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
वे जगत् के आदि कारण, जगत् के रचयिता, अजन्मा, ईश्वर, अमर, मन की उत्पत्ति के मूल कारण, आकाश और वायु के स्वरूप, तेज के आश्रय, जल के रचयिता, पृथ्वी के परम कारण, देवता, दानव, यक्ष और मनुष्य के परम कारण, समस्त योगों के परम आश्रय, ब्रह्मवेत्ताओं के प्रत्यक्ष कोष, चराचर जगत के रचयिता और संहारकर्ता, इन्द्र के प्रताप और सूर्यदेवता आदि के भी प्रतापी हैं। वे गुणों को प्रकट करने वाले ईश्वर थे। उनके क्रोध में काल का वास था। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने मन, वाणी, बुद्धि और कर्मों के द्वारा उनकी आराधना की। 44-47॥
 
He is the original cause of the world, the creator of the world, the unborn, God, the immortal, the main cause of the origin of the mind, the form of sky and air, the shelter of light, the creator of water, the supreme cause of the earth, the supreme cause of gods, demons, yakshas and human beings, the ultimate shelter of all yogas, the direct treasure of Brahmavettas, the creator and destroyer of the living world, the majesty of Indra and the majesty of Sun God etc. He was the God who revealed the qualities. Kaal resided in his anger. At that time Lord Shri Krishna worshiped him through his mind, speech, intellect and actions. 44-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)