श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 8: द्रोणाचार्यके पराक्रम और वधका संक्षिप्त समाचार  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  7.8.22 
तन्वता परमास्त्राणि शरान् सततमस्यता।
द्रोणेन विहितं दिक्षु शरजालमदृश्यत॥ २२॥
 
 
अनुवाद
द्रोणाचार्य ने निरन्तर बाणों की वर्षा करके तथा अपने उत्तम अस्त्रों का प्रयोग करके सब दिशाओं में बाणों का जाल बुन दिया, जो स्पष्ट दिखाई दे रहा था ॥22॥
 
Dronacharya, by continuously showering arrows and using his best weapons, weaved a net of arrows in all directions, which was clearly visible. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)