|
| |
| |
श्लोक 7.79.44  |
एवं चैतत् करिष्यामि यथा मामनुशाससि।
सुप्रभातामिमां रात्रिं जयाय विजयस्य हि॥ ४४॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| कल प्रातःकाल अर्जुन की विजय के लिए आप मुझे जो कुछ करने की आज्ञा देंगे, मैं उसे उसी प्रकार अवश्य पूरा करूँगा ॥ 44॥ |
| |
| Whatever you order me to do tomorrow morning for the victory of Arjuna, I will certainly accomplish it in the same manner. ॥ 44॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि कृष्णदारुकसम्भाषणे एकोनाशीतितमोऽध्याय:॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्ण और दारुककी बातचीतविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७९॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|