vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 7: द्रोण पर्व
»
अध्याय 79: श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन
»
श्लोक 43
श्लोक
7.79.43
दारुक उवाच
जय एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजय:।
यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान्॥ ४३॥
अनुवाद
दारुक बोला- पुरुषसिंह! जिसके सारथी आप हैं, उसकी विजय निश्चित है। उसे कैसे पराजित किया जा सकता है?॥ 43॥
Daruk said— Purushsingh! The one whose charioteer you are, his victory is certain. How can he be defeated?॥ 43॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×