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श्लोक 7.79.43  |
दारुक उवाच
जय एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजय:।
यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान्॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| दारुक बोला- पुरुषसिंह! जिसके सारथी आप हैं, उसकी विजय निश्चित है। उसे कैसे पराजित किया जा सकता है?॥ 43॥ |
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| Daruk said— Purushsingh! The one whose charioteer you are, his victory is certain. How can he be defeated?॥ 43॥ |
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