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mahabharat 7.79.37-39h: दारुक! उसमें एक छत्र रखकर अग्नि और सूर्य के समान चमकने वाले तथा विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य स्वर्णमयी जालियों से सुशोभित मेरे चार श्रेष्ठ घोड़ों - बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य और सुग्रीव - को भी जोत ले और स्वयं भी कवच ​​पहनकर तैयार हो जा ॥37-38 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.79: श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 79: श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन  »  श्लोक 37-39h
 
 
श्लोक  7.79.37-39h 
छत्रं जाम्बूनदैर्जालैरर्कज्वलनसप्रभै:॥ ३७॥
विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि विभूषितान्।
बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च॥ ३८॥
युक्तान् वाजिवरान् यत्त: कवची तिष्ठ दारुक।
 
 
अनुवाद
दारुक! उसमें एक छत्र रखकर अग्नि और सूर्य के समान चमकने वाले तथा विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य स्वर्णमयी जालियों से सुशोभित मेरे चार श्रेष्ठ घोड़ों - बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य और सुग्रीव - को भी जोत ले और स्वयं भी कवच ​​पहनकर तैयार हो जा ॥37-38 1/2॥
 
Daruk! Also, by placing an umbrella in it, harness my four best horses - Balahak, Meghpushp, Shaibya and Sugriv, who shine like fire and sun and are decorated with divine golden webs made by Vishwakarma, and also be ready wearing armor yourself. 37-38 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)