| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 79: श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन » श्लोक 35-37h |
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| | | | श्लोक 7.79.35-37h  | गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनु: शरान्॥ ३५॥
आरोप्य वै रथे सूत सर्वोपकरणानि च।
स्थानं च कल्पयित्वाथ रथोपस्थे ध्वजस्य मे॥ ३६॥
वैनतेयस्य वीरस्य समरे रथशोभिन:। | | | | | | अनुवाद | | सूत! कौमोद की गदा, दिव्य शक्ति, चक्र, धनुष, बाण आदि सब आवश्यक वस्तुओं को रथ पर स्थापित करके, उसके पृष्ठ भाग में युद्धभूमि में रथ को सुशोभित करने वाले वीर विनतानंदन गरुड़ के प्रतीक ध्वज के लिए स्थान बनाओ। | | | | Suta! Having placed Kaumod's mace, divine power, discus, bow, arrows and all other essential items on the chariot, make a place in its rear portion for the flag bearing the symbol of the brave Vinatanandan Garuda, who adorns the chariot in the battleground. | | ✨ ai-generated | | |
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