श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 78: सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  7.78.27-28 
राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती।
चतुराश्रमिणां पुण्यै: पावितानां सुरक्षितै:॥ २७॥
दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम्।
पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘पुत्र! सदाचार का पालन करने वाले राजा लोग और अपने संचित पुण्यों के प्रभाव से पवित्र हुए चारों आश्रमों के लोग जिस सनातन मोक्ष को प्राप्त करते हैं, उसी मोक्ष को तुम भी प्राप्त करो, जो दीन-दुखियों पर दया करने वाले, घर में बांटकर उत्तम वस्तुओं का उपयोग करने वाले और चुगली से दूर रहने वाले लोग प्राप्त करते हैं॥ 27-28॥
 
‘Son! The eternal salvation that kings attain by following good conduct and the people of the four ashramas who are purified by the effect of their accumulated virtues, may you also attain the same salvation that those who are kind to the poor, those who use the best things by distributing them in the house and those who stay away from backbiting, attain.॥ 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)