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mahabharat 7.74.31: कौरव, पाण्डव, वृष्णि योद्धा, अन्य मनुष्य तथा मैं, मेरा पुत्र - ये सभी चंचल (नाशवान) हैं - ऐसा सोचते हैं ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 7.74: जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 74: जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  7.74.31 
कुरव: पाण्डवाश्चैव वृष्णयोऽन्ये च मानवा:।
अहं च सह पुत्रेण अध्रुवा इति चिन्त्यताम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
कौरव, पाण्डव, वृष्णि योद्धा, अन्य मनुष्य तथा मैं, मेरा पुत्र - ये सभी चंचल (नाशवान) हैं - ऐसा सोचते हैं ॥31॥
 
Kauravas, Pandavas, Vrishni warriors, other human beings and I along with my son – all of them are unstable (perishable) – think like this. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)