श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  7.73.45-46h 
धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिता:।
ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम्॥ ४५॥
यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम्।
 
 
अनुवाद
यदि मैं इस रात्रि के बाद कल जयद्रथ को न मारूँ, तो ऊपर बताए गए पापियों और जिनका नाम नहीं लिया गया है, उन पापियों के समान मेरी भी शीघ्र ही वही दशा होगी। ॥45 1/2॥
 
I too will soon suffer the same fate as the sinners I have mentioned above and those who have not been named, if I do not kill Jayadratha tomorrow after this night. ॥ 45 1/2 ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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