श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 35-37
 
 
श्लोक  7.73.35-37 
संश्रितं चापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम्।
न बिभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम्॥ ३५॥
अर्हते प्रातिवेश्याय श्राद्धं यो न ददाति च।
अनर्हेभ्यश्च यो दद्याद् वृषलीपतये तथा॥ ३६॥
मद्यपो भिन्नमर्याद: कृतघ्नो भर्तृनिन्दक:।
तेषां गतिमियां क्षिप्रं न चेद्धन्यां जयद्रथम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जो क्रूर स्वभाव वाला मनुष्य शरणागत पुरुष, साधु पुरुष और आज्ञापालन करने में तत्पर व्यक्ति को त्याग देता है तथा उसका साथ नहीं देता, जो उपकारक की निन्दा करता है, जो पड़ोस में रहने वाले सुपात्र को श्राद्ध का दान न देकर कुपात्रों को दान देता है तथा जो ब्राह्मण शूद्र का स्वामी है, जो मद्यपान करने वाला है, धर्म की मर्यादा को तोड़ने वाला है, कृतघ्न है और अपने स्वामी का अपमान करता है - जो दुर्गति इन सब लोगों को प्राप्त होती है, वही मुझे भी शीघ्र प्राप्त हो; यदि मैं कल जयद्रथ का वध न करूँ ॥35-37॥
 
The person of cruel nature who abandons a surrendered person, a saintly person and a person who is ready to follow orders and does not support him, who criticizes the benefactor, who does not give Shraddha donations to the worthy person living in the neighborhood and gives donations to the unworthy people and the Brahmin who is the master of Shudra, who is a drinker of alcohol, breaks the religious limits, is ungrateful and insults his master - the misery that all these people get, May I also attain the same soon; If I don't kill Jayadratha tomorrow. 35-37॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas