श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 29-31
 
 
श्लोक  7.73.29-31 
वेदाध्यायिनमत्यर्थं संशितं वा द्विजोत्तमम्॥ २९॥
अवमन्यमानो यान् याति वृद्धान् साधून् गुरूंस्तथा।
स्पृशतो ब्राह्मणं गां च पादेनाग्निं च या भवेत्॥ ३०॥
याऽप्सु श्लेष्म पुरीषं च मूत्रं वा मुञ्चतां गति:।
तां गच्छेयं गतिं कष्टां न चेद्धन्यां जयद्रथम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं कल जयद्रथ को न मारूँ, तो मेरी भी वही दुःखद गति हो जाए, जो ब्राह्मण, गौ या अग्नि को पैर से छूने वाले मनुष्य की होती है, तथा जल में थूकने वाले या मल-मूत्र त्यागने वाले मनुष्य की होती है ॥29-31॥
 
If I do not kill Jayadratha tomorrow, then I too will attain the same painful fate, which is the fate of a Brahmin, a cow or a man who touches fire with his feet, and the fate of a person who spits or spits urine or feces in the water. 29-31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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