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श्लोक 7.73.20-21  |
अर्जुन उवाच
सत्यं व: प्रतिजानामि श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम्।
न चेद् वधभयाद् भीतो धार्तराष्ट्रान् प्रहास्यति॥ २०॥
न चास्मान् शरणं गच्छेत् कृष्णं वा पुरुषोत्तमम्।
भवन्तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम्॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| अर्जुन ने कहा- मैं आप सबके सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि कल जयद्रथ का अवश्य वध करूँगा। महाराज! यदि वह मारे जाने के भय से धृतराष्ट्रपुत्रों को छोड़कर मुझमें, पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण में अथवा आपकी शरण में न आए, तो मैं कल उसका अवश्य वध करूँगा। |
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| Arjun said- I am taking a true oath in front of you all that I will surely kill Jayadratha tomorrow. Maharaj! If he does not leave the sons of Dhritarashtra in fear of being killed and does not take refuge in me, Purushottama Shri Krishna or you, then I will surely kill him tomorrow. |
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