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mahabharat 7.73.2: वे अपनी रथियों की सेना को पंक्तिबद्ध करके बार-बार प्रयत्न करते थे और हम लोग भी युद्धभूमि में पंक्तिबद्ध होकर अपनी सेना को पंक्तिबद्ध करके द्रोणाचार्य को सब प्रकार से आगे बढ़ने से रोकते थे॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 7.73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.73.2 
व्यूढानीका वयं द्रोणं वारयाम: स्म सर्वश:।
प्रतिव्यूह्य रथानीकं यतमानं तथा रणे॥ २॥
 
 
अनुवाद
वे अपनी रथियों की सेना को पंक्तिबद्ध करके बार-बार प्रयत्न करते थे और हम लोग भी युद्धभूमि में पंक्तिबद्ध होकर अपनी सेना को पंक्तिबद्ध करके द्रोणाचार्य को सब प्रकार से आगे बढ़ने से रोकते थे॥ 2॥
 
He used to make repeated efforts by forming his army of chariots in formation and we, having organized our army in the battle-field in the form of a formation, used to stop Dronacharya from advancing in every possible way.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)