श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 73: युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 18-20h
 
 
श्लोक  7.73.18-20h 
प्रतिलभ्य तत: संज्ञां वासवि: क्रोधमूर्च्छित:॥ १८॥
कम्पमानो ज्वरेणेव नि:श्वसंश्च मुहुर्मुहु:।
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान्॥ १९॥
उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् इन्द्रपुत्र अर्जुन होश में आकर क्रोध से ऐसे व्याकुल हो गए मानो ज्वर से काँप रहे हों - बार-बार गहरी साँस लेते हुए तथा आँखों से आँसू बहाते हुए हाथों को मलते हुए तथा उन्मत्त की भाँति देखते हुए इस प्रकार बोले -॥18-19 1/2॥
 
Thereafter Arjuna, son of Indra, regaining consciousness, became agitated with anger as if he were shivering with fever - taking deep breaths repeatedly and rubbing his hands with tears flowing from his eyes and looking like a madman, he spoke like this -॥18-19 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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