| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 72: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध » श्लोक d1-d4h |
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| | | | श्लोक 7.72.d1-d4h  | (धृतराष्ट्र उवाच
अथ संशप्तकै: सार्धं युध्यमाने धनंजये।
अभिमन्यौ हते चापि बाले बलवतां वरे॥
महर्षिसत्तमे याते युधिष्ठिरपुरोगमा:।
पाण्डवा: किमथाकार्षु: शोकेन हतचेतस:॥
कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वज:।
केन वा कथित: तस्य प्रशान्त: सुतपावक:॥
एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह संजय।) | | | | | | अनुवाद | | धृतराष्ट्र ने पूछा - संजय! जब अर्जुन संशप्तकों के साथ युद्ध कर रहे थे, तब बलवानों में श्रेष्ठ बालक अभिमन्यु मारा गया और जब ऋषियों में श्रेष्ठ व्यास (युधिष्ठिर को सान्त्वना देकर) चले गए, तब शोक से व्याकुल युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने क्या किया? वानरों के ध्वजवाहक अर्जुन संशप्तकों के पास से कैसे लौटे और उन्हें किसने बताया कि अग्नि के समान तेजस्वी उनका पुत्र सदा के लिए मौन हो गया है? ये सब बातें विस्तारपूर्वक मुझसे कहो। | | | | Dhritarashtra asked - Sanjay! When Arjun was fighting with the Samshaptakas, when the best among the strong, the child Abhimanyu was killed and when the best among the sages Vyas (after consoling Yudhishthira) left, what did Yudhishthira and the other Pandavas, who were distraught with grief, do? How did Arjun, the flag bearer of the monkeys, return from the Samshaptakas and who told him that his son, who was as brilliant as fire, has become silent forever. Tell me all these things in detail. | | ✨ ai-generated | | |
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