श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 72: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  7.72.83 
आहोस्विद् भूषणार्थाय वर्म शस्त्रायुधानि व:।
वाचस्तु वक्तुं संसत्सु मम पुत्रमरक्षताम्॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
क्या ये तुम्हारे कवच और अस्त्र-शस्त्र शरीर के आभूषण के लिए हैं? क्या ये मेरे पुत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि योद्धाओं की सभा में अपनी बात कहने के लिए हैं?'
 
‘Or are these armours and weapons of yours meant to be used as ornaments for the body? Are they not meant to protect my son but to make a point in the assembly of warriors?’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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