श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 72: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध  »  श्लोक 62-63h
 
 
श्लोक  7.72.62-63h 
आगमिष्यति व: क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मण:॥ ६२॥
अधर्मो हि कृतस्तीव्र: कथं स्यादफलश्चिरम्।
 
 
अनुवाद
‘तुम्हें अपने पापकर्मों का फल शीघ्र ही मिलेगा। तुमने घोर पाप किए हैं। उनका फल मिलने में अब विलम्ब कैसे हो सकता है?॥62 1/2॥
 
‘You will soon receive the fruits of your sinful deeds. You have committed grave sins. How can there be much delay in receiving the fruits of that?॥ 62 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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