श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 72: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध  »  श्लोक 49-51h
 
 
श्लोक  7.72.49-51h 
पीड्यमान: शरैस्तीक्ष्णै: कर्णद्रोणकृपादिभि:॥ ४९॥
नानालिङ्गै: सुधौताग्रैर्मम पुत्रोऽल्पचेतन:।
इह मे स्यात् परित्राणं पितेति स पुन: पुन:॥ ५०॥
इत्येवं विलपन् मन्ये नृशंसैर्भुवि पातित:।
 
 
अनुवाद
‘जब कर्ण, द्रोण और कृपाचार्य आदि मेरे पुत्र को नाना प्रकार के तीखे बाणों से पीड़ित कर देते और उसकी चेतना क्षीण होने लगती, तब अभिमन्यु बार-बार विलाप करके कहता कि यदि मेरे पिता यहाँ होते, तो मेरे प्राण बच जाते। मैं सोचता हूँ, उस अवस्था में उन क्रूर शत्रुओं ने पृथ्वी पर ही उसे मार डाला होगा।॥49-50 1/2॥
 
‘When Karna, Drona and Kripacharya etc. would have afflicted my son with various kinds of sharp arrows with shining tips and his consciousness would have started to fade, then Abhimanyu would have repeatedly lamented and said that if my father had been here, my life would have been saved. I think, in that condition those ruthless enemies must have killed him on the earth.॥ 49-50 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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