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mahabharat 7.72.1-3: संजय बोले - हे भरतश्रेष्ठ! समस्त प्राणियों के संहार का वह भयंकर दिन बीत जाने पर, जब सूर्य पश्चिम दिशा में चला गया और संध्या का समय आ गया, जब सब सैनिक विश्राम के लिए शिविर में चले गए, तब वानरों के ध्वजवाहक विजयी अर्जुन अपने दिव्यास्त्रों से संशप्तकों का वध करके अपने विजयी रथ पर आरूढ़ होकर शिविर की ओर चले। चलते हुए वे आँसुओं से भरे हुए कंठ से भगवान गोविन्द से बोले -॥1-3॥   |   mahabharat अध्याय 7.72: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 72: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  7.72.1-3 
संजय उवाच
तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षये।
आदित्येऽस्तं गते श्रीमान् संध्याकाल उपस्थिते॥ १॥
व्यपयातेषु वासाय सर्वेषु भरतर्षभ।
हत्वा संशप्तकव्रातान् दिव्यैरस्त्रै: कपिध्वज:॥ २॥
प्रायात् स शिबिरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय तं रथम्।
गच्छन्नेव च गोविन्दं साश्रुकण्ठोऽभ्यभाषत॥ ३॥
 
 
अनुवाद
संजय बोले - हे भरतश्रेष्ठ! समस्त प्राणियों के संहार का वह भयंकर दिन बीत जाने पर, जब सूर्य पश्चिम दिशा में चला गया और संध्या का समय आ गया, जब सब सैनिक विश्राम के लिए शिविर में चले गए, तब वानरों के ध्वजवाहक विजयी अर्जुन अपने दिव्यास्त्रों से संशप्तकों का वध करके अपने विजयी रथ पर आरूढ़ होकर शिविर की ओर चले। चलते हुए वे आँसुओं से भरे हुए कंठ से भगवान गोविन्द से बोले -॥1-3॥
 
Sanjaya said - O best of the Bharatas! After that dreadful day of killing of all the living beings had passed, when the Sun went to the west and the evening time arrived, when all the soldiers went to the camp for rest, then the victorious Arjuna, the flag-bearer of the monkeys, after killing the Sanshpatakas with his divine weapons, proceeded towards the camp seated on his victorious chariot. While walking, he spoke to Lord Govinda with his throat filled with tears in his mouth -॥1-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)