श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 71: नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  7.71.11 
अकृतार्थश्च भीतश्च न च सान्नाहिको हत:।
अयज्वा त्वनपत्यश्च ततोऽसौ जीवित: पुन:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
सृंजय का पुत्र कवच धारण करके युद्ध करते हुए भी नहीं मारा गया था। उसे अतृप्त और भयभीत होकर प्राण त्यागने पड़े थे। वह यज्ञ-कर्म से रहित था और पुत्रहीन भी था। इसीलिए नारद जी ने उसे पुनः जीवित कर दिया था॥11॥
 
The son of Srinjaya was not killed while fighting in the war wearing armour. He had to give up his life in a state of discontent and fear. He was devoid of any yajna karma and was also childless. That is why Narada ji brought him back to life.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)