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mahabharat 7.70.14-16h: भृगुनन्दन परशुरामजी ने हजारों-लाखों करोड़ क्षत्रियों के रक्त की धाराओं से, इन्द्रगोप (वीर-बहूटी) नामक कीट से तथा पुष्प के समान रंग वाले बन्धुजीव (दुपहरिया) के रक्त से, अनेक तालाबों को भर दिया और अठारह द्वीपों को अपने अधीन करके उत्तम दक्षिणाओं सहित सौ पवित्र यज्ञ किये। 14-15 1/2   |   mahabharat अध्याय 7.70: परशुरामजीका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 70: परशुरामजीका चरित्र  »  श्लोक 14-16h
 
 
श्लोक  7.70.14-16h 
कोटीशतसहस्राणि क्षत्रियाणां सहस्रश:।
इन्द्रगोपकवर्णस्य बन्धुजीवनिभस्य च॥ १४॥
रुधिरस्य परीवाहै: पूरयित्वा सरांसि च।
सर्वानष्टादश द्वीपान् वशमानीय भार्गव:॥ १५॥
ईजे क्रतुशतै: पुण्यै: समाप्तवरदक्षिणै:।
 
 
अनुवाद
भृगुनन्दन परशुरामजी ने हजारों-लाखों करोड़ क्षत्रियों के रक्त की धाराओं से, इन्द्रगोप (वीर-बहूटी) नामक कीट से तथा पुष्प के समान रंग वाले बन्धुजीव (दुपहरिया) के रक्त से, अनेक तालाबों को भर दिया और अठारह द्वीपों को अपने अधीन करके उत्तम दक्षिणाओं सहित सौ पवित्र यज्ञ किये। 14-15 1/2
 
Bhrigunandan Parshuram filled so many ponds with the streams of blood of thousands and millions of crores of Kshatriyas, the insect named Indragop (Veer-Bahuti) and the blood of Bandhujiva (Dupahriya) – the color like a flower, and after taking all the eighteen islands under his control, he performed hundred sacred yagyas with excellent dakshinas. 14-15 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)