श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 69: राजा पृथुका चरित्र  »  श्लोक 10-12
 
 
श्लोक  7.69.10-12 
तं वनस्पतय: शैला देवासुरनरोरगा:।
सप्तर्षय: पुण्यजना गन्धर्वाप्सरसोऽपि च॥ १०॥
पितरश्च सुखासीनमभिगम्येदमब्रुवन्।
सम्राडसि क्षत्रियोऽसि राजा गोप्ता पितासि न:॥ ११॥
देह्यस्मभ्यं महाराज प्रभु: सन्नीप्सितान् वरान्।
यैर्वयं शाश्वतीस्तृप्तीर्वर्तयिष्यामहे सुखम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
एक दिन जब राजा पृथु सुखपूर्वक बैठे हुए थे, तब वनस्पतियाँ, पर्वत, देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, सप्त ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ और पितर आदि उनके पास आकर बोले, 'महाराज! आप हमारे सम्राट, क्षत्रिय, राजा, रक्षक और पिता हैं। कृपया हमें इच्छित वर प्रदान करें, जिससे हम चिरकाल तक संतोष और सुख का अनुभव कर सकें। आप ऐसा करने में समर्थ हैं।'॥10-12॥
 
One day, when King Prithu was sitting comfortably, plants, mountains, gods, demons, men, snakes, seven sages, virtuous people (Yaksha), Gandharva, Apsara and ancestors came to him and said, 'Maharaj! You are our emperor, Kshatriya, king, protector and father. Please give us the desired boon, so that we can experience satisfaction and happiness for eternity. You are capable of doing this.'॥10-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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