श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 68: राजा भरतका चरित्र  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  7.68.16-17 
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया॥ १६॥
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा:।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
श्वेता संजय! वह चारों शुभ गुणों में तुमसे श्रेष्ठ था और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी मृत्यु से नहीं बच सका, तो अन्य लोग कैसे बच सकते हैं? इसलिए, तुम अपने उस पुत्र के लिए शोक मत करो जो यज्ञ और दान से वंचित है। ऐसा नारदजी ने कहा।
 
Shvaitya Sanjaya! He was superior to you in all the four auspicious qualities and was more pious than your son. When even he could not escape death, how can others be saved? Therefore, do not grieve for your son who is deprived of sacrifices and donations. This is what Naradji said.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये अष्टषष्टितमोऽध्याय:॥ ६८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)