श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 67: राजा रन्तिदेवकी महत्ता  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  7.67.1-2 
नारद उवाच
सांकृतिं रन्तिदेवं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम।
यस्य द्विशतसाहस्रा आसन् सूदा महात्मन:॥ १॥
गृहानभ्यागतान् विप्रानतिथीन् परिवेषका:।
पक्वापक्वं दिवारात्रं वरान्नममृतोपमम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं- संजय! मैंने सुना है कि संकृति के पुत्र रन्तिदेव भी जीवित नहीं रह सके। उस महाबली राजा के पास दो लाख रसोइये थे, जो उसके घर आये हुए ब्राह्मण अतिथियों को दिन-रात अमृत के समान मधुर उत्तम कच्चा-पक्का भोजन परोसते थे।॥1-2॥
 
Naradji says- Sanjaya! I have heard that Sankriti's son Rantidev also could not survive. That great king had two lakh cooks who used to serve the best raw and cooked food day and night, as sweet as nectar, to the Brahmin guests who came to his house.॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)