श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 66: राजा गयका चरित्र  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  7.66.18-19 
यत्र भोजनशिष्टस्य पर्वता: पञ्चविंशति:॥ १८॥
कुल्या: कुशलवाहिन्यो रसानामभवंस्तदा।
वस्त्राभरणगन्धानां राशयश्च पृथग्विधा:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञ में खाए गए अन्न और पेय पदार्थों से पच्चीस पर्वत अन्न के बच गए थे। उस समय रस को कुशलतापूर्वक बहा ले जाने वाली अनेक छोटी-छोटी नदियाँ तथा नाना प्रकार के वस्त्र, आभूषण और सुगन्धित द्रव्य भी बच गए थे।॥18-19॥
 
Twenty-five mountains of food grains were left over from the food and drinks consumed in that yajna. Many small rivers carrying the juices skillfully and various quantities of clothes, ornaments and perfumes were also left at that time.॥ 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)