श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 66: राजा गयका चरित्र  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  7.66.14-15 
स समुद्रवनद्वीपनदीनदवनेषु च।
नगरेषु च राष्ट्रेषु दिवि व्योम्नि च येऽवसन्॥ १४॥
भूतग्रामाश्च विविधा: संतृप्ता यज्ञसम्पदा।
गयस्य सदृशो यज्ञो नास्त्यन्य इति तेऽब्रुवन्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञ की धन-संपत्ति से संतुष्ट होकर समुद्र, वन, द्वीप, नदी, सरिता, वन, नगर, राष्ट्र, आकाश और स्वर्ग में रहने वाले नाना प्रकार के प्राणी कहने लगे कि राजा गय के समान यज्ञ और किसी ने नहीं किया।
 
Satisfied with the wealth of that yajna, the various kinds of creatures residing in the sea, forest, island, river, stream, forest, city, nation, sky and heaven started saying that no one else has performed a yajna like that of King Gaya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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