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mahabharat 7.64.17: श्वेता सृंजय! वह उपरोक्त चारों शुभ गुणों में आपसे श्रेष्ठ था और आपके पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी जीवित नहीं रह सका, तो अन्यों की तो बात ही क्या? अतः आपको अपने उस पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए जो यज्ञ और दान से वंचित हो गया है। ऐसा नारदजी ने कहा।   |   mahabharat अध्याय 7.64: राजा अम्बरीषका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 64: राजा अम्बरीषका चरित्र  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.64.17 
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा:।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
श्वेता सृंजय! वह उपरोक्त चारों शुभ गुणों में आपसे श्रेष्ठ था और आपके पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी जीवित नहीं रह सका, तो अन्यों की तो बात ही क्या? अतः आपको अपने उस पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए जो यज्ञ और दान से वंचित हो गया है। ऐसा नारदजी ने कहा।
 
Shvaitya Srinjaya! He was superior to you in all the four auspicious qualities mentioned above and was even more pious than your son. When even he could not survive, what to say about others? Therefore, you should not grieve for your son who has been deprived of sacrifices and donations. This is what Naradji said.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये चतु:षष्टितमोऽध्याय:॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)