Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 7.63.11: श्वेता सृंजय! वह धर्म, ज्ञान, वैराग्य और धन इन चारों गुणों में आपसे कहीं अधिक श्रेष्ठ था और आपके पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी जीवित नहीं रह सका, तो अन्यों की तो बात ही क्या? अतः आप अपने उस पुत्र के लिए शोक न करें, जिसने न तो यज्ञ किया और न ही दक्षिणा दी। ऐसा नारदजी ने कहा। | mahabharat अध्याय 7.63: राजा ययातिका उपाख्यान । mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा:।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत्॥ ११॥
अनुवाद
श्वेता सृंजय! वह धर्म, ज्ञान, वैराग्य और धन इन चारों गुणों में आपसे कहीं अधिक श्रेष्ठ था और आपके पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी जीवित नहीं रह सका, तो अन्यों की तो बात ही क्या? अतः आप अपने उस पुत्र के लिए शोक न करें, जिसने न तो यज्ञ किया और न ही दक्षिणा दी। ऐसा नारदजी ने कहा।
Shvaitya Srinjaya! He was far superior to you in the four auspicious qualities of Dharma, knowledge, detachment and wealth and was even more pious than your son. When even he could not survive, what to say about others? Therefore, do not grieve for your son who neither performed the yagya nor gave dakshina. This is what Naradji said.
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥