श्लोक 1-2: नारदजी कहते हैं- सृंजय! मैंने सुना है कि नहुषानन्दन राजा ययातिकी भी मर गये। राजा ने अपनी इच्छानुसार सौ राजसूय, सौ अश्वमेघ, एक हजार पुण्डरीक यज्ञ, सौ वाजपेय यज्ञ, एक हजार अतिरात्र यज्ञ तथा चातुर्मास्य तथा अग्निष्टोम आदि अनेक प्रकार के प्रचुर दक्षिणा यज्ञ किये।
श्लोक 3: इस पृथ्वी पर ब्राह्मण-द्रोही लोगों के पास जो भी धन था, वह सब छीनकर उन्होंने ब्राह्मणों को सौंप दिया ॥3॥
श्लोक 4: नदियों में परम पवित्र सरस्वती नदी, समुद्र, पर्वत और अन्य जलधाराएँ यज्ञ में लगे हुए परम पुण्यात्मा राजा ययाति को घी और दूध प्रदान करने लगीं॥4॥
श्लोक 5-7: जब देवताओं और देवियों में युद्ध छिड़ गया, तब देवताओं की सहायता से उन्होंने नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा भगवान का यज्ञ सम्पन्न किया और सम्पूर्ण पृथ्वी को चार भागों में विभाजित करके उसे चार प्रकार के ब्राह्मणों - ऋत्विज, अध्वर्यु, होता और उद्गाता - में बाँट दिया। फिर शुक्रकन्या देवयानी और दैत्यराज की पुत्री शर्मिष्ठा के गर्भ से एक गुणवान बालक को उत्पन्न करके वह देवराज द्वितीय इन्द्र के समान अपनी इच्छानुसार समस्त देवताओं में विचरण करता रहा। 5-7॥
श्लोक 8: जब सांसारिक सुखों के भोग में उन्हें शांति नहीं मिली, तब समस्त वेदों के ज्ञाता राजा ययाति ने निम्नलिखित श्लोक का गान किया और अपनी पत्नियों के साथ वन में चले गए।
श्लोक 9: श्लोक इस प्रकार है: इस पृथ्वी पर चावल, जौ, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ आदि सभी खाद्य पदार्थ एक भी मनुष्य को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं; ऐसा समझकर मनुष्य को अपने मन को शांत करना चाहिए॥9॥
श्लोक 10: इस प्रकार, यशस्वी राजा ययाति ने धैर्य का आश्रय लेकर तथा समस्त कामनाओं का त्याग करके अपने पुत्र पुरु को राजसिंहासन पर बिठाया और वन को चले गये।
श्लोक 11: श्वेता सृंजय! वह धर्म, ज्ञान, वैराग्य और धन इन चारों गुणों में आपसे कहीं अधिक श्रेष्ठ था और आपके पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी जीवित नहीं रह सका, तो अन्यों की तो बात ही क्या? अतः आप अपने उस पुत्र के लिए शोक न करें, जिसने न तो यज्ञ किया और न ही दक्षिणा दी। ऐसा नारदजी ने कहा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥