श्लोक d1-1: नारदजी कहते हैं - संजय! हमने सुना है कि अपने पूर्वजों को मुक्ति देने के लिए गंगा को इस पृथ्वी पर लाने वाले राजा भगीरथ भी मर गए हैं। जिन महामनस्वी राजा के पराक्रम से इन्द्र अत्यंत प्रसन्न हुए थे, जिन्होंने प्रचुर एवं उत्तम दक्षिणा, हविष्यादि, मन्त्र और अन्न से युक्त सौ अश्वमेध यज्ञ करके देवताओं का सुख बढ़ाया था, जिनके महान यज्ञ में सोमरस पीकर इन्द्र मतवाले हो गए थे और जिनके यहाँ रहकर पूज्य भगवान देवेन्द्र ने अपने पराक्रम से हजारों दैत्यों को परास्त किया था, उन्हीं राजा भगीरथ ने यज्ञ करते हुए गंगा के दोनों तटों पर सोने की ईंटों के घाट बनवाये थे।
श्लोक 2: इतना ही नहीं, उसने अनेक राजाओं और राजकुमारों को जीतकर उनसे स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित दस लाख कन्याएँ लाकर ब्राह्मणों को दान कर दीं॥ 2॥
श्लोक 3: वे सभी कन्याएँ रथों पर बैठी थीं। प्रत्येक रथ में चार घोड़े थे। प्रत्येक रथ के पीछे सोने के हारों से सजे सौ हाथी चल रहे थे।
श्लोक 4: प्रत्येक हाथी के पीछे हजारों घोड़े चल रहे थे, प्रत्येक घोड़े के पीछे सैकड़ों गायें चल रही थीं, तथा गायों के पीछे भेड़-बकरियों के झुंड चल रहे थे।
श्लोक 5: राजा भगीरथ गंगा के तट पर प्रचुर दक्षिणा देते हुए रहते थे, अतः उनके व्रत के समय जल के प्रवाह से अभिभूत होकर देवी गंगा अत्यंत व्याकुल हो गईं और पास के एक राजा की गोद में आकर बैठ गईं॥5॥
श्लोक 6: इस प्रकार भगीरथ की पुत्री होने के कारण गंगाजी भागीरथी कहलायीं और उन पर विराजमान होने के कारण उर्वशी नाम से विख्यात हुईं। राजा का पुत्री के रूप में प्रेम और उन्हें नरक से बचाने के कारण उस समय उन्हें पुत्र के रूप में भी प्रेम प्राप्त हुआ।
श्लोक 7: सूर्य के समान तेजस्वी और मधुरभाषी गन्धर्वों ने देवताओं, पितरों और मनुष्यों की बात सुनते हुए प्रसन्नतापूर्वक इस गान का गायन किया॥7॥
श्लोक 8: यज्ञ करते समय भूयसी दक्षिणा देने वाले इक्ष्वाकुवंश के धनी राजा भगीरथ को समुद्र-पत्नी गंगादेवी ने अपना पिता स्वीकार किया। 8॥
श्लोक 9: इन्द्रसहित समस्त देवताओं ने उसके यज्ञ को सुशोभित किया था, उसकी आहुतियों को विधिपूर्वक ग्रहण किया था, समस्त विघ्नों को दूर करके उसे निर्विघ्न पूर्ण किया था॥9॥
श्लोक 10: जो भी ब्राह्मण अपनी रुचि की कोई वस्तु प्राप्त करना चाहता था, राजा, जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया था, उसे वह वस्तु तुरन्त दे देता था।
श्लोक 11: उनके पास जो भी अमूल्य धन था, वह ब्राह्मण के लिए अप्राप्य नहीं था। राजा भगीरथ ने ब्राह्मणों की कृपा से ब्रह्मलोक प्राप्त किया। 11.
श्लोक 12: हे शत्रुओं की स्थिति और आशाओं का नाश करने वाले संजय! राजा भगीरथ ने ज्ञान और ध्यान रूपी प्रमुख यज्ञ को स्वीकार किया था। इसीलिए किरणों का पान करने वाले महर्षि भी उस ब्रह्मलोक में जाकर संयमी राजा भगीरथ के पास रहने की इच्छा रखते थे।
श्लोक 13-14h: श्वेता सृंजय! भगीरथ उपरोक्त चारों गुणों में आपसे कहीं श्रेष्ठ थे। उनके गुण आपके पुत्र से कहीं अधिक थे। जब वे ही जीवित नहीं रह सके, तो अन्यों का क्या होगा? अतः आपको अपने उस पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए जो यज्ञ और दान से वंचित है। नारद जी ने भी राजा सृंजय से यही कहा था। 13 1/2।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥