श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 59: भगवान् श्रीरामका चरित्र  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  7.59.15-16h 
वेदैश्चतुर्भि: सुप्रीता: प्राप्नुवन्ति दिवौकस:॥ १५॥
हव्यं कव्यं च विविधं निष्पूर्तं हुतमेव च।
 
 
अनुवाद
चारों वेदों के स्वाध्याय से प्रसन्न होकर देवता और पितर नाना प्रकार के तर्पण और श्राद्ध ग्रहण करते थे। सर्वत्र इष्ट (यज्ञ-यागादि) और पूर्त (वापी, कूप, तड़ाग और वृक्षारोपण आदि) के अनुष्ठान होते रहते थे।
 
The gods and ancestors, pleased with the self-study of the four Vedas, used to receive various types of offerings and poems. Rituals of Ishta (Yagya-Yagadi) and Purta (Vapi, Kup, Tadag and tree plantation etc.) were being performed everywhere.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)