श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 56: राजा सुहोत्रकी दानशीलता  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  7.56.11-12 
काम्यनैमित्तिकाजस्रैरिष्टां गतिमवाप्तवान्।
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया॥ ११॥
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा:।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजा ने नित्य, नैमित्तिक और काम्य यज्ञों का निरन्तर अनुष्ठान करके अभीष्ट गति प्राप्त की । श्वेत सृंजय ! वे भी धर्म, ज्ञान, त्याग और धन इन चारों कल्याणकारी विषयों में तुमसे बहुत श्रेष्ठ थे । वे तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर जाएँ, तब तुम्हें अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए; क्योंकि तुम्हारे पुत्र ने न तो कोई यज्ञ किया था और न उसमें दानशीलता का गुण था । नारदजी ने भी राजा सृंजय से यही बात कही । 11-12॥
 
The king achieved the desired speed by continuously performing Nitya, Naimitika and Kamya Yagyas. White Srinjay! They too were much better than you in the four welfare subjects of religion, knowledge, renunciation and wealth. He was more virtuous than your son. When he also died, you should not feel sorry for your son; Because your son had neither performed any yagya nor had the quality of generosity. Naradji said the same thing to King Srinjay. 11-12॥
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)