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mahabharat 7.55.d4: हे राजनश्रेष्ठ! अपनी आसक्ति त्याग दीजिए! आपके समान पुरुष आसक्त नहीं होते। महाराज! धैर्य रखिए! मैं आपको ज्ञान में श्रेष्ठ मानता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 7.55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  7.55.d4 
त्यज मोहं नृपश्रेष्ठ न हि मुह्यन्ति त्वद्विधा:।
धीरो भव महाराज ज्ञानवृद्धोऽसि मे मत:॥)
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! अपनी आसक्ति त्याग दीजिए! आपके समान पुरुष आसक्त नहीं होते। महाराज! धैर्य रखिए! मैं आपको ज्ञान में श्रेष्ठ मानता हूँ।
 
O best of kings! Give up your attachment! Men like you do not get attached. Maharaj! Have patience! I consider you to be superior in knowledge.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)