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mahabharat 7.55.d1-24: व्यासजी कहते हैं - हे राजन! तब ऋषि ने कहा - 'ऐसा ही होगा'। उनके ऐसा कहने पर राजा को इच्छित पुत्र की प्राप्ति हुई। ऋषि की कृपा से वह सुन्दर पुत्र सोने की खान निकला। राजा ऐसा ही पुत्र चाहते थे। रोते समय उनकी आँखों से स्वर्ण-अश्रु गिरते थे। इसीलिए उस पुत्र का नाम सुवर्णष्ठीवी प्रसिद्ध हुआ। वरदान के प्रभाव से वह अपनी सम्पत्ति को अनंत गुना बढ़ाने लगा।   |   mahabharat अध्याय 7.55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना  »  श्लोक d1-24
 
 
श्लोक  7.55.d1-24 
व्यास उवाच
तथा भविष्यतीत्युक्ते जज्ञे तस्येप्सित: सुत:॥
काञ्चनस्याकर: श्रीमान् प्रसादाच्च सुकाङ्क्षित:।
अपतत् तस्य नेत्राभ्यां रुदतस्तस्य नेत्रजम्॥)
सुवर्णष्ठीविरित्येवं तस्य नामाभवत् कृतम्।
तस्मिन् वरप्रदानेन वर्धयत्यमितं धनम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं - हे राजन! तब ऋषि ने कहा - 'ऐसा ही होगा'। उनके ऐसा कहने पर राजा को इच्छित पुत्र की प्राप्ति हुई। ऋषि की कृपा से वह सुन्दर पुत्र सोने की खान निकला। राजा ऐसा ही पुत्र चाहते थे। रोते समय उनकी आँखों से स्वर्ण-अश्रु गिरते थे। इसीलिए उस पुत्र का नाम सुवर्णष्ठीवी प्रसिद्ध हुआ। वरदान के प्रभाव से वह अपनी सम्पत्ति को अनंत गुना बढ़ाने लगा।
 
Vyasji says - O King! Then the sage said - 'It will be so'. On his saying so, the king got the desired son. By the grace of the sage, that beautiful son turned out to be a mine of gold. The king wanted such a son. While crying, golden tears used to fall from his eyes. That is why the name of that son became famous as Suvarnashthivi. Due to the effect of the boon, he started increasing his wealth infinitely. 24.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)