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mahabharat 7.55.32-33h: उस समय वे विचारहीन, मूर्ख और दुष्ट डाकू उस अद्भुत और असंभव जगत् पुत्र को मारकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस युद्ध से वे भी नष्ट हो गए और घोर नरक में गिर पड़े।   |   mahabharat अध्याय 7.55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  7.55.32-33h 
दस्यवश्च तदान्योन्यं जघ्नुर्मूर्खा विचेतस:।
हत्वा परस्परं नष्टा: कुमारं चाद्भुतं भुवि॥ ३२॥
असम्भाव्यं गता घोरं नरकं दुष्टकारिण:।
 
 
अनुवाद
उस समय वे विचारहीन, मूर्ख और दुष्ट डाकू उस अद्भुत और असंभव जगत् पुत्र को मारकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस युद्ध से वे भी नष्ट हो गए और घोर नरक में गिर पड़े।
 
At that time those thoughtless, foolish and wicked bandits, after killing that wonderful and impossible son of the world, started killing each other. By this fighting they too were destroyed and fell into a terrible hell. 32 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)