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mahabharat 7.55.19-20: एक दिन राजा पर प्रसन्न होकर पुत्र चाहने वाले, तप और स्वाध्याय में तत्पर तथा वेद-वेदांगों के पारंगत विद्वान् सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने मिलकर नारदजी से कहा - 'हे प्रभु! आप इस राजा सृंजय को इच्छित पुत्र प्रदान करें ॥19-20॥   |   mahabharat अध्याय 7.55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 55: षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  7.55.19-20 
तस्य प्रसन्ना विप्रेन्द्रा: कदाचित् पुत्रमीप्सव:॥ १९॥
तप:स्वाध्यायनिरता वेदवेदाङ्गपारगा:।
सहिता नारदं प्राहुर्देह्यस्मै पुत्रमीप्सितम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
एक दिन राजा पर प्रसन्न होकर पुत्र चाहने वाले, तप और स्वाध्याय में तत्पर तथा वेद-वेदांगों के पारंगत विद्वान् सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने मिलकर नारदजी से कहा - 'हे प्रभु! आप इस राजा सृंजय को इच्छित पुत्र प्रदान करें ॥19-20॥
 
One day, being pleased with the king, all the best Brahmins who wanted to give him a son, who were engaged in penance and self-study and were expert scholars of the Vedas and Vedangas, together said to Naradji - 'O Lord! Please grant the desired son to this king Srinjay. 19-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)