श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 54: मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  7.54.52 
व्यपेतशोक: प्रीतोऽस्मि भगवन्नृषिसत्तम।
श्रुत्वेतिहासं त्वत्तस्तु कृतार्थोऽस्म्यभिवादये॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! महामुनि! आपसे यह कथा सुनकर मेरा दुःख दूर हो गया है। मैं प्रसन्न और संतुष्ट हूँ और आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ॥ 52॥
 
Lord! Great sage! Hearing this story from you, my sorrow has gone away. I am happy and satisfied and I bow down to your feet. ॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)