श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 54: मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.54.12 
नारद उवाच
एवमुक्ताभवत् प्रीता प्राञ्जलिर्भगवन्मुखी।
संहारे नाकरोद् बुद्धिं प्रजानां हितकाम्यया॥ १२॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - हे राजन! ब्रह्माजी की यह बात सुनकर वह स्त्री हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गई और मन में बहुत प्रसन्न हुई; किन्तु अपनी प्रजा के कल्याण की इच्छा से उसका मन वध करने में नहीं लगा।
 
Narada says - O King! On hearing Lord Brahma say this, the woman stood facing him with folded hands and was very happy in her heart; but due to the desire for welfare of her subjects, she did not concentrate on the task of killing.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)