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mahabharat 7.53.5: मैं इस अनन्त ब्रह्माण्ड को नष्ट करने के अनेक उपाय सोचता रहा, परन्तु कोई उपाय मुझे नहीं सूझ रहा था। इसलिए मैं क्रोध से भर गया ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 7.53: शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 53: शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.53.5 
ततोऽहं नाधिगच्छामि तथा बहुविधं तदा।
संहारमप्रमेयस्य ततो मां मन्युराविशत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मैं इस अनन्त ब्रह्माण्ड को नष्ट करने के अनेक उपाय सोचता रहा, परन्तु कोई उपाय मुझे नहीं सूझ रहा था। इसलिए मैं क्रोध से भर गया ॥5॥
 
I thought about several ways to destroy this infinite universe, but I could not think of any solution. That is why I was filled with anger. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)