श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 53: शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  7.53.21-22h 
त्वं हि संहारबुद्धॺाथ प्रादुर्भूता रुषो मम।
तस्मात् संहर सर्वांस्त्वं प्रजा: सजडपण्डिता:॥ २१॥
मम त्वं हि नियोगेन तत: श्रेयो ह्यवाप्स्यसि।
 
 
अनुवाद
‘देवी! तुम मेरे क्रोध के कारण वध करने के उद्देश्य से प्रकट हुई हो, इसलिए मूर्ख और विद्वान् सभी मनुष्यों का वध करती रहो। तुम्हें मेरी आज्ञा के अनुसार यह कार्य करना होगा। ऐसा करने से तुम्हारा कल्याण होगा।’॥21 1/2॥
 
‘Goddess! You have appeared due to my anger with the intention of killing, so keep on killing all the people, foolish and learned. You have to do this work as per my orders. By doing this you will attain welfare.’॥ 21 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)