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mahabharat 7.53.15: नारद जी कहते हैं - हे राजन! अपनी प्रजा के कल्याण के लिए महादेव के इन वचनों को सुनकर भगवान ब्रह्मा ने पुनः उस क्रोध को अपनी अन्तरात्मा में समाहित कर लिया।   |   mahabharat अध्याय 7.53: शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 53: शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.53.15 
नारद उवाच
श्रुत्वा हि वचनं देव: प्रजानां हितकारणे।
तेज: संधारयामास पुनरेवान्तरात्मनि॥ १५॥
 
 
अनुवाद
नारद जी कहते हैं - हे राजन! अपनी प्रजा के कल्याण के लिए महादेव के इन वचनों को सुनकर भगवान ब्रह्मा ने पुनः उस क्रोध को अपनी अन्तरात्मा में समाहित कर लिया।
 
Narada says - O King! After listening to these words of Mahadev for the welfare of his subjects, Lord Brahma once again absorbed that anger in his inner soul.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)