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mahabharat 7.50.3: उस समय, जब सूर्य क्षितिज पर पहुँचकर अस्त हो रहा था, वह कमल के मुकुट के समान दिखाई दे रहा था। वह अद्भुत संध्या, जो दिन और रात्रि का मिलन-काल थी, सियारों की भयानक चीखों के कारण अशुभ प्रतीत हो रही थी।   |   mahabharat अध्याय 7.50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.50.3 
ततो निशाया दिवसस्य चाशिव:
शिवारुतै: संधिरवर्तताद्भुत:।
कुशेशयापीडनिभे दिवाकरे
विलम्बमानेऽस्तमुपेत्य पर्वतम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उस समय, जब सूर्य क्षितिज पर पहुँचकर अस्त हो रहा था, वह कमल के मुकुट के समान दिखाई दे रहा था। वह अद्भुत संध्या, जो दिन और रात्रि का मिलन-काल थी, सियारों की भयानक चीखों के कारण अशुभ प्रतीत हो रही थी।
 
At that time, when the sun was setting after reaching its horizon, it looked like a crown made of lotus. That wonderful evening, which was the junction of day and night, seemed inauspicious due to the terrifying cries of female jackals.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)