श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 50: तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  7.50.11-12 
शरीरसंघातवहा ह्यसृग्जला
रथोडुपा कुञ्जरशैलसङ्कटा।
मनुष्यशीर्षोपलमांसकर्दमा
प्रविद्धनानाविधशस्त्रमालिनी॥ ११॥
भयावहा वैतरणीव दुस्तरा
प्रवर्तिता योधवरैस्तदा नदी।
उवाह मध्येन रणाजिरे भृशं
भयावहा जीवमृतप्रवाहिनी॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उस समय श्रेष्ठ योद्धाओं ने युद्धभूमि में रक्त की एक नदी छोड़ दी, जो वैतरणी के समान भयंकर और भयानक प्रतीत हो रही थी। उसमें जल के स्थान पर रक्त की धारा बह रही थी। उसमें शवों के ढेर तैर रहे थे। उसमें तैरते हुए रथ नावों के समान प्रतीत हो रहे थे। हाथियों के शरीर वहाँ पर्वतीय चट्टानों के समान फैले हुए थे। मनुष्यों की खोपड़ियाँ चट्टानों के समान और मांस कीचड़ के समान प्रतीत हो रहा था। वहाँ पड़े हुए नाना प्रकार के टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्र माला के समान प्रतीत हो रहे थे। वह अत्यन्त भयानक नदी युद्धभूमि के मध्य में बहती हुई जीवितों के साथ-साथ मृतकों को भी बहा ले जा रही थी॥11-12॥
 
At that time, the best warriors unleashed a river of blood on the battlefield, which appeared as fierce and dreadful as the Vaitarni. Instead of water, a stream of blood flowed in it. Heaps of bodies were floating in it. Chariots floating in it appeared like boats. The bodies of elephants were spread there like mountain rocks. Human skulls appeared like rocks and flesh like mud. Various types of weapons lying there broken and broken appeared like garlands. That extremely dreadful river flowed in the middle of the battlefield and carried away the dead as well as the living.॥11-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)