| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 49: अभिमन्युका कालिकेय, वसाति और कैकय रथियोंको मार डालना एवं छ: महारथियोंके सहयोगसे अभिमन्युका वध और भागती हुई अपनी सेनाको युधिष्ठिरका आश्वासन देना » श्लोक 16-19 |
|
| | | | श्लोक 7.49.16-19  | तं तथा पतितं शूरं तावका: पर्यवारयन्।
दावं दग्ध्वा यथा शान्तं पावकं शिशिरात्यये॥ १६॥
विमृद्य नगशृङ्गाणि संनिवृत्तमिवानिलम्।
अस्तंगतमिवादित्यं तप्त्वा भारतवाहिनीम्॥ १७॥
उपप्लुतं यथा सोमं संशुष्कमिव सागरम्।
पूर्णचन्द्राभवदनं काकपक्षवृताक्षिकम्॥ १८॥
तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा तावकास्ते महारथा:।
मुदा परमया युक्ताश्चुक्रुशु: सिंहवन्मुहु:॥ १९॥ | | | | | | अनुवाद | | इस प्रकार आपके सैनिकों ने गिरते हुए वीर अभिमन्यु को चारों ओर से घेर लिया। जैसे ग्रीष्म ऋतु में वन को जलाकर अग्नि बुझ जाती है, जैसे वृक्षों की शाखाओं को तोड़कर वायु शान्त हो जाती है, जैसे संसार को कष्ट देकर सूर्य अस्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा को ग्रहण लग गया है और जैसे समुद्र सूख गया है, उसी प्रकार सम्पूर्ण कौरव सेना को कष्ट देकर पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाला अभिमन्यु भूमि पर पड़ा हुआ था; उसके नेत्र उसके सिर के लम्बे केशों (काकपक्ष) से ढके हुए थे। उसे उस अवस्था में देखकर आपके महारथी बड़े हर्ष से बार-बार गर्जना करने लगे। | | | | Thus, your soldiers surrounded the fallen valiant Abhimanyu from all sides. Just as the fire in the summer season is extinguished after burning the forest, just as the wind is calming down after breaking the branches of the trees, just as the sun has set after tormenting the world, just as the moon has been eclipsed and just as the ocean has dried up, in the same way, after tormenting the entire Kaurava army, Abhimanyu with a face like the full moon was lying on the ground; his eyes were covered by the long hair on his head (Kaakpaksha). Seeing him in that condition, your great warriors started roaring repeatedly with great joy. | | ✨ ai-generated | | |
|
|